लव बिटवीन कल्ट्स
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1.
करीम और वैशाली को साथ रहते दो बरस से ज्यादा का समय हो गया था और अगर उसमें विवाह पूर्व के आदर्शवादी रोमानियत वाले समय को जोड़ दें तो कुल जमा सात बरस बीत गए। आखिर के दो बरस मानो कुछ एक मनमुटाव के साथ बीत ही गए लेकिन दोनों में भविष्य की चिंता के प्रश्न दिन ब दिन बढ़ते ही जा रहे थे। अगर यह प्रश्न विवाह पूर्व ही उठा कर हल कर लिए गए होते या इनके परिणामों के सम्बंध में विचार विमर्श हो जाता तो रोज रात घर का कमरा विवादों की युध्दभूमि नही बनता।
आखिर सोलह सत्रह बरस की उम्र में ये प्रश्न उठते भी कैसे? क्या उस उम्र में प्लेटोनिक प्रेम का आवेश जाति, धर्म, लिंग देखता है भला ? दोनो बारहवीं की मैथ की कोचिंग में मिले थे और कब वृत्त त्रिभुज में समा गया वक्त ही नही लगा। बारहवीं के बाद करीम बड़े शहर कैरियर की तलाश में निकला वहीं वैशाली मानो घर की चौखट की शान बनकर किचेन में बाँध दी गई। लेकिन वैशाली और करीम के बीच भौगोलिक दूरी प्रेम को रोक नही सकी। वैशाली करीम के मैसेज का रोज इंतजार करती और समयबद्ध तरीके से वो बातचीत से बंधे रहे। यह करते हुए कुल पाँच बरस बीत गए। इस बीच महज कुछ चिंताओं पर दोनो में बातें होती रहती थी जिसे करीम यह कहकर विदा देता की मैं इतना सफल होऊँगा की करीम खान और वैशाली मिश्रा का विवाह किसी भी विवाद का कारण नही बनेगा। यह आश्वासन वैशाली को सूबेदार पिता संतोष मिश्रा के आर्मी शासन में बंधकर रहना बोझिल करता रहा।
आखिरकार वैशाली ने एक रात करीम को फोन करते हुए कहा की यहाँ की घुटन अब नही सही जाती। मुझे तुम आकर ले चलो।
करीम ने लगभग हिचकते हुए वैशाली से कल सुबह बात करने के लिए कहा और यह आश्वासन दिया कुछ उपाय करते हैं।
उपाय नही अब समाधान चाहती हूँ। मेरे साँसों की डोरी तुम्हारे पास है।
करीम ने सुबह ही बातचीत की जिसमें तमाम कोशिशों के बाद भाग जाने की जिद पर अड़ी वैशाली ने जब करीम पर धोखा देने का लांछन लगाया तो अंततः करीम आवेश में मुंबई से जौनपुर की ओर रवाना हो गया । न जाने कितने प्रेमी युगल संयम की कमी से सीमाएँ तोड़ते है और आवेश में , कसमों का आधार जीवन की कसौटी बन जाता है। निस्संदेह यह उम्र का फलसफ़ा है इसे अच्छा या बुरा कैसे घोषित किया जाए यह तो जीवन की निरंतरता में परिस्थितियों की पौध है।
अगले ही दिन करीम और वैशाली ने बांद्रा कोर्ट में दस्तक दी। जब भी एक लड़का और लड़की कोर्ट परिसर में घुसते हैं वहाँ सीमित अफरातफरी का माहौल मच जाता है। दुनिया के लिए जो प्रेम कत्ल करने का आधार बन जाता है वह वकीलों की आँखों में पर्याप्त चमक लाने वाला था। सभी वकील घेरकर रेट की सौदेबाजी में अडे थे, तब करीम ने रुककर वकील रमाशंकर को तय कर लिया।
वकील रमाशंकर द्विवेदी ने स्थिति को समझते हुए कहा कि दोनों में से किसी एक को अपना धर्म बदलना पडेगा। करीम ने इसे न्यायिक प्रक्रिया बस मानते हुए अपने धर्म परिवर्तन की स्वीकृति दे दी। लेकिन वैशाली ने रोकते हुए कहा कि मैं मुस्लिम बनूँगी और वैशाली आधिकारिक रूप से सबाना खातून बन गई । वैशाली के लिए यह एक कानूनी प्रक्रिया भर थी लेकिन यह प्रक्रिया भर न थी बल्कि एक नई जकड़न की शुरुआत थी।
वकील ने पेपर पर हस्ताक्षर करवाये और काजी को बुलाया। काजी ने करीम और वैशाली से कुबूलनामा करवाते हुए , वैशाली से कलमा पढ़ने के लिए कहा- “ला इलाहा इलल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाहि"। वैशाली ने सरलता से पढ़ दिया जिससे काजी को कहना पड़ा हजारों शादियों के बाद पहली बार इतनी सहजता से किसी लड़की ने कलमा को बिना त्रुटि के पढा है। आखिर वैशाली ने घर पर रहते हुए ही सही समाजशास्त्र से उच्चतम अंको में स्नातक किया था ,साथ ही धार्मिक, सामाजिक किताबें पढ़ना उसके शौक थे। तभी वकील ने आगे बढ़ते हुए दोनों को ऑनर किलिंग के प्रतिरक्षी के रूप में एनओसी बनाया और दोनों को विदा किया। वैशाली और करीम के उद्दीप्त मनोवेग में लिए गए निर्णय की परिणति हुई। दोनो ने गहरी साँसे ली जिसमें नीले आसमान तले न केवल दो लोगों का मिलन पूरा हुआ बल्कि दो हवाएँ भी मिली जिसमें कहीं आर्द्रता थी तो कहीं शुष्कता।
2.
वैशाली तुम्हे कई बार कहा है जब तक अब्बू यहाँ रुके हैं सर पर कपड़ा तो रख लिया करो ।
करीम भूल जाती हूँ और रोज- रोज हर बात पर टोंकते हो। यूँ चिल्लाते हो मानो मैने कुतुबमीनार के आधार की ईंट निकाल ली हो। कभी यह शर्त की अम्मी के साथ बाहर जाना है तो उनकी तरह बुर्का पहनो ,कभी यह की रमजान में कम से कम मेरा साथ दो। वक्त के साथ बदलना लाज़िम है लेकिन जितना तुम बदले हो उतना नही बदला जाता।
इसमें बुरा भी क्या है? किसी के साथ रहना है तो थोड़ा मैनेज करना ही पड़ता है।
क्या तुम्हें कभी मैनेज करना पड़ा है?
मैंने तुम्हारे कहने पर घर में एक भी मूर्ति नही रखी और न ही मैं रखना चाहती। मैने जीवनभर कटे हुए माँस को नही देखा लेकिन तुम्हारे लिए बनाती हूँ। मैने ऐसा कोई कार्य नही किया जो तुम्हारे मजहब को अपमानित करे लेकिन मुझे उसे मानने के लिए क्यों बाध्य करते हो। करीम तुममे और एक आम व्यक्ति में रत्ती भर फर्क नही रह गया। तुमने मैनेजमेंट पर पीएचडी की थीसिस लिखनी शुरू कर दी है और यह बाध्यताएँ तुम्हे अच्छी लगती हैं?
यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है वैशाली। हजारों वर्षों से बड़ो के सम्मान के लिए सिर पर पल्लू का रिवाज है।
इसे तुम संस्कृति कहते हो? संस्कृति शब्द संस्कार से बना है अर्थात काल परिवर्तन के साथ मूल्यों, व्यवहारों को परिवर्तित करना। यह संस्कृति नही परम्पराएँ हैं और परम्पराएँ वंचित वर्ग की शोषक ही रही हैं जिन्हें संस्कृति और धर्म के नाम पर रचा गया।ताकि पितृसत्ता और धर्मसत्ता बनी रहे। तुम पुरुषों ने ऊँची आवाज में चिल्ला कर और महिलाओं को ऑब्जेक्ट बनाकर ही अपनी आधारशिला को सींचा है।
क्या तुम्हारे लिए धर्म और संस्कृति कुछ मायने भी रखता है?
धर्म मेरे लिए समाज के संचालन के लिए आवश्यक नैतिक सिद्धांतो का समूह है जिसका आधार तर्क है। जब इसमें किसी के स्वार्थ के लिए परम्पराओं और रुढियों की परत चढ़ती है तो यह मज़हब बन जाता है। इसमें मंदिर के कँगूरों से लेकर मस्जिद की मीनारों तक सारे आडम्बर हैं। इसमें बुर्के से लेकर घूँघट तक सब तुम पुरुषों की कुंठाओं का नतीजा है। कुतर्क जब सम्मानित होने लगे और तर्क जब बाजारों में कौड़ियों के भाव बिकने लगे तब परम्पराएँ पुरुषों, मुल्लों और पण्डों द्वारा संस्कृति कही जाती है।
वैशाली समाज और मजहब भी कुछ होता है उससे बचा नही जा सकता ।
जब तुम्हारे साथ शादी के लिए मैने निर्णय लिया था तभी हम दोनों ने सारे परिवार और समाज की अवहेलना की तब तुमने यह प्रश्नचिन्ह नही किया । तब तुम्हारे सारे कुतर्कों का विलोप प्रेम में हो गया। अब प्रेम गौण हो गया या कुचल दिया गया करीम। समाज और संस्कृति का केंद्र व्यक्ति में टिका है। व्यक्ति की गौणता कैसे तार्किक है?
हाँ , व्यक्ति गौण ही होता है। समाज का प्रभाव अनंत है। प्रेम भावावेश में किया जाता है लेकिन भावावेश समाप्त होते ही समाज की कसावट शुरू होती है।
करीम अब जीवन की सहजता से ज्यादा महत्वपूर्ण तुम्हारे लिए समाज की कसावट है। तुमने मुझे धोखा दिया है। तुमने मुझे वो मिट्टी बना दिया है जिसे जब चाहा जो चाहा अपने अनुसार ढाल लिया।
तुम सहजता चाहती हो तो तुम इस घर को सम्भालो । मैं तुम्हे हर महीने की शुरुआत में आवश्यक रुपये भेज दिया करूँगा। मेरा बहरीन का वीजा लगने वाला है और तीन वर्षों के कॉन्ट्रैक्ट पर जा रहा हूँ। अगर जीवन में सहज हो जाना तो सूचित कर देना।
करीम तुमने मुझसे इसके लिए पूँछा तक नही ? तुम्हारे फैसले मेरा जीवन निर्धारित करते हैं और मुझे इसमें जगह तक नही दी गई।
मेरा यही फैसला है। मैं सात दिन के अंदर निकलूँगा तब तक किसी दोस्त के यहाँ जा रहा हूँ। यह आश्वस्त करता हूँ कि पैसे महीने की शुरुआत में ही आ जाया करेगें ।
पैसे सिर्फ पेट चलाते हैं करीम जीवन नही। तुमने फिर मुझे .......।
करीम ने जरूरी सामान जुटाया और निकल गया। वैशाली बेड के कोने में उसे एकटक देखकर रोती रही। उसकी नजरे किसी नजर की तलाश में मृत। वैशाली ने दो बरस पहले अंतिम फैसला लिया था। घर में कोहराम ने सन्नाटे को हवा दी और सन्नाटे ने कोहराम को।
एक लम्हा आया था , गुजर भी गया पर उसे भूलने में जमाने लगे!
- जितेंद्र गुप्ता