सोमवार, 11 मई 2020

वन मॉर्निंग विद वन साइड
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साल की अंतिम लम्बी कुहराई रात के बाद नए साल की सर्द भरी सुबह में दरवाजे के खटकने की आहट से सुभाष जगा । अचंभित सा सोंच में पड़ गया , सुभाष जिस कोने में दुबके से किसी धड़बे में रहता है वहाँ सूरज की रोशनी भी पहुँचने में देर करती है वहाँ सर्द सबेरे किसी की आहट एकांत खेल में तल्लीन बच्चे को जबरन भोजन के लिए विवश करने जैसा था। सुभाष ने किसी अनजान को समझकर अंदर से ही चिल्लाया कौन है भाई ? 

उधर से महीनों पहले सुनी आवाज - मैं हूँ, मैं आकांक्षा। 

सुभाष ने आतुरता से दरवाजा खोला - अक्कू तुम? अंदर आओ!

तुम सो रहे थे अभी तक?

हूँ, कल रात नींद नही  आ रही थी इसलिए देर से सोया। 

आँख मीचते सुभाष नोस्टाल्जिक हो गया...।

कुछ ही माह पहले तो पत्र लिखा था उसे उलाहना देते हुए। मैंने पत्र में भी उदार रवैया नही अपनाया था वही पोटैशियम साइनाइड से भरे शब्द  बस कुछ गहरी भावपूर्ण लाइनें लिखी थी जिसमें वह पीड़ा ढूँढने की कोशिश कर सकती थी । 


सुभाष ने बिस्तर को सही करते हुए पूँछा, इतनी सुबह तुम यहाँ , कम से कम  फोन करके आने की सूचना देती! 


तब तुम रात भर सोते नही और नए साल की सुबह थकी हुई नही लगनी चाहिए।  रात में सोंचा की तुमसे मिलना है , इसलिए चली आई , यहीं पास में ही तो है 20 मिनट लगते हैं। 


अभी तक तो पास न था! खैर!


तुमसे कुछ बात करनी थी। कुछ बहुत जरुरी। 


मुझसे?


हूँ , तुम मेरे दोस्त हो और हमेशा मेरा साथ दिया है। तुम मार्गदर्शक और रहनुमा हो जिसने मुझे सम्भाला और सही रास्ते दिए है।  


सुभाष ने महसूस कर लिया था ये दो दिए गए नए रिश्ते काफी हैं , ........।


मार्गदर्शक ! जिसमें प्रेम का विलोप और श्रद्धा का दर्पण हो। जिसके समक्ष अपना मूल स्वभाव , स्वाभाविकता और अस्त व्यस्त भाव स्वतः कुचल दिए जाएं या छिपने लगें जिसमें अस्वाभाविकता का अनुशासन हो।वहीं प्रेमी पथहीनता ,आसक्तता, स्वछंदता और स्वाभाविकता का पर्याय। 


दोस्त ! सर्वस्व होते हुए भी अधूरा। इसमें श्रद्धा का विलोप और निष्काम प्रेम( प्लेटोनिक लव) का प्रदर्शन।   इसमें न्योछावर होने का गुण तो है लेकिन प्रेम का सार नही। प्रेम और दोस्ती में निश्चित दूरी सन्निहित है। दोस्त के लिए रात रात होती है पूर्णिमा या अमावस्या के चाँद की रात नही। दोस्त आँसुओं का प्रभाव कम करता है , आँसुओं का कारण नही बनता। 


सुभाष ने उसकी चित्तवृत्ति को जानने के लिए  धीमे स्वर में पूँछा -  कॉफी लोगी!


कॉफी का नाम मत लो। कॉफी और गौमूत्र में कोई अंतर नही होता, इसी तंज के साथ तुम अकेले छोड़कर चले आये थे । तुम मेरी जिद के सामने थोड़ा सा भी नही झुक सके।तब से अभी तक 5 महीने होने को है तुमने फोन तक नही किया। तुम पुरुषों ने दुनिया की सारी महिलाओं को ऑब्जेक्ट बनाकर रखा है। "आषाढ़ का एक दिन" की नायिका मल्लिका हो  या "त्यागपत्र " की नायिका मृणाल हो पुरुषों ने अपने दम्भ और दुराग्रहों से महिलाओं को त्रासदी के सिवाय दिया क्या है! 


क्या तुम मेरी पीड़ाओं को दुराग्रह घोषित करना चाहती हो?
 

तुम्हारी पीड़ाओं के पीछे छिपे उद्देश्यों और अंतर्निहित चेतना को मैं अब दुराग्रह ही मानती हूँ। 


तुम्हारी न्यून अभिव्यक्तियाँ मुझे कचोटती है। तुम सिर्फ एक भारी और दार्शनिक पत्र लिख सकते हो। यही तुम करते आये हो। तुमने मेरे साथ जिया क्या है? महज कविताएँ, शब्द और यांत्रिकता.....। प्रेम में विस्तार होता है जिसे तुमने वकालत का तर्क बना दिया है। उसमें युवाओं की नवीनता और नवाचार का व्यवहार चाहिए , बूढ़े लोगों  की बीतीं कहानियाँ नहीं। प्रेम में  कोई सिद्धांत नही, नियम नही बल्कि नियम विहीनता चाहिए। इसे दार्शनिक स्तर पर नही जिया जाता , समर्पण से जिया जाता है।


आकांक्षा ने लगभग झुके चेहरे से हाव - भाव ठीक किए और बताया कि अब वह हैदराबाद छोड़कर जा रही है। उसे रिसर्च के लिए अनुमति मिल गई है। साथ ही कोलकाता में अब माँ के साथ रहेगी।


तुमने हैदराबाद छोड़ने का निर्णय  ले लिया? 


हाँ , इस शहर से अब मैं  लिपट कर नही रहना चाहती। तुम जानते हो , इस शहर को कभी न छोड़ने का मेरा निर्णय गलत साबित हुआ । इसे छोड़ना ही मेरी परिणति है। मैं इसमें अब थम सी गई हूँ । इस शहर में दर्प है सुकून नही । अब मुझे नई साँसे और नई स्फूर्ति चाहिए.....।


सम्भवतः अब उसने जीवन की नई रूपरेखा तैयार कर ली है। उसमें जाते हुए उस क्षण सुभाष के प्रति दोस्ती कहीं नही दिखी  न ही मार्गदर्शक  का दस्तूर। उसकी आँखों ने विदा ली । सुभाष ने पथ प्रदर्शक की तरह कृत्रिम गम्भीर भावों  से उसे बाहर विदा किया। 


नए साल  की नई सुबह,मानों सुर्ख आंखों में थका सा समंदर!

- जितेंद्र गुप्ता।

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